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नक्सलवाद मुक्त भारत, भय मुक्त भारत: ‘लाल आतंक’ के गर्त से निकलकर शिक्षा-रोजगार-विकास से जुड़ रहा जनजातीय समाज

तेजस समाचार - LIVE
गुरुवार, 8 जनवरी 2026, जनवरी 08, 2026 WIB Last Updated 2026-01-08T11:47:57Z



दैनिक शाक्य समाचार 
शैलेश श्रीवास्तव 


यह दौर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को वर्षों की मानसिक गुलामी और गुमनाम भय से मुक्त करने का है। विगत एक दशक में राष्ट्र की उत्तरोत्तर प्रगति को देखकर कभी–कभी मुझे लगता है कि सही मायनों में भारत 1947 में नहीं, अपितु 2014 में स्वतंत्र हुआ है। देश की महनीय जनता ने 2014 में अपनी बागडोर संघ, सनातन और संस्कृति के प्रति श्रद्धा और भारत की प्रतिष्ठा को समृद्ध करने वाली पार्टी भाजपा के हाथ में सौंपकर इस नए भारत का सूत्रपात कर दिया है।

65 वर्ष की जो आधी और तथाकथित स्वतंत्रता हमें मिली थी, उसके साथ विभाजन की त्रासदी, अखंडित भारत और बौद्धिकता के नाम पर आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद का भय भी मिला। हम स्वतंत्र हुए लेकिन हमारी आत्मा किसी बंधन में थी। वर्तमान सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने सबसे पहले ऐसे निर्णय लेने का साहस दिखाया, जिससे हम स्वतंत्रता की सोंधी महक को अनुभव कर सकें।

आजादी का अमृत महोत्सव, जी–20 में भारतीय नेतृत्व, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, नशामुक्त भारत, तीन तलाक की मुक्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, CAA, ऑपरेशन सिंदूर, आत्मनिर्भर भारत, सबका साथ सबका विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा जैसे तमाम विचार इस देश की जनता को पहली बार सुनने-देखने को मिले। इसके साथ ही नई भारतीय न्याय संहिता में समाज हित के लिए कुछ सांविधिक परिवर्तन जैसे कदम उठाकर सरकार ने भारत की न्याय व्यवस्था को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।  

इसी क्रम में, नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आरंभ हुआ। उनका यह विचार मुझे राजनीतिक समीकरण से अधिक सुरक्षा बलों के उन हजारों योद्धाओं और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे आम जनता की आत्मा की शांति के हवन जैसा लगा, जिन्हें नक्सलवादियों द्वारा बेरहमी से मार दिया गया था। हमने वह भयानक दौर भी देखा है, जब वामपंथियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वनवासी समाज की भोली-भाली जनता को इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम पकड़ानी थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए गए, जिन्हें किताबें देनी थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के कांटे बो दिए गए।यह कितना सुखद है कि आज भारत उसी वनवासी समाज के एक गुमनाम नायक बिरसा मुंडा की जयंती को वैश्विक आधार देते हुए उन्हें ‘भगवान बिरसा मुंडा’ की उपाधि से विभूषित कर रहा है। वर्षों तक विकास के नाम पर जिस समाज को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित करके रखा गया, आज सरकार उनके अधिकार के लिए नियम बना रही है। वर्तमान सरकार के गठन को एक दशक बीत चुका है। आतंकवाद और नक्सलवाद की जड़े हिलने लगी हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भारत को नक्सलवाद मुक्त करने का संकल्प लेकर उपेक्षित जनता को भी विकसित भारत के विजन से जोड़ दिया है।

विकसित भारत की जो संकल्पना इस देश ने की है, गृहमंत्री ने उससे भी सुंदर, सशक्त और समर्थ भारत देने का प्रण लिया है। नक्सलमुक्त भारत का भाव इतना पावन है कि उसकी सिद्धि होनी निश्चित है। आप सोचिए कि कैसा देश बनाया जा रहा था, जहाँ सत्ता में बने रहने के लिए अपने ही राष्ट्र के कुछ हिस्से को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर नक्सलवादी बना दिया गया। जिस समाज को बराबर की हिस्सेदारी मिलनी थी, उसे उपेक्षा मिली। यह पहली बार हुआ, जब देश के प्रथम नागारिक और राष्ट्र के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक वनवासी महिला को बैठने का अवसर मिला।

यह भी पहली बार हुआ जब प्रधान मंत्री और गृह मंत्री ने नक्सलवाद प्रभावित लोगों को उस गर्त से निकाल कर उन्हें शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ा और उनसे निरंतर सार्थक संवाद किया। गृह मंत्री ने स्वयं उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की। 

भाजपा और संघ की मूल भावना में सेवा, समर्पण और त्याग है। इसी के माध्यम से भारत सुशासन की बुनियाद तैयार करने में सफल हुआ है। प्रधानमंत्री ने वामपंथ के वैचारिक उग्रवाद से देश को मुक्त करने के लिए नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान आरंभ कर दिया है जिसे गृह मंत्री द्वारा विस्तार कर दिया जा रहा है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि नक्सलवाद से मुक्ति का अभियान किसी विचारधारा का एजेंडा नहीं, बल्कि सुशासन द्वारा समाज में हिंसा, निरंकुशता को समाप्त करने का प्रण है।  एक दशक पूर्व नक्सलवाद, आतंकवाद की जो घटनाएँ प्रतिदिन हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी, वो पिछले एक दशक में लगभग 60 प्रतिशत कम हुईं हैं।वामपंथियों द्वारा संरक्षित और पोषित उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका था, जो नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़े जमाए हुए था। भारत के वनवासी क्षेत्रों में, मुख्यत: छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में इनकी गतिविधियाँ निरंतर भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं। गृह मंत्रालय के एक आँकड़े के अनुसार, 2013 में जहाँ लगभग 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वह वर्तमान में 10 के आस-पास रह गई है। गृह मंत्री के द्वारा इन्हें भी 31 मार्च 2026 तक समूल खत्म करने का लक्ष्य तय कर दिया गया है। 

बीते छह महीनों के आँकड़ों को ही यदि देखा जाय, तो नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में सबसे निर्णायक बात यह रही कि सुरक्षा बलों ने सीधे नक्सली नेतृत्व को निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के घने जंगलों में चले अभियानों में मोदम बालकृष्ण उर्फ बाला कृष्णा, दंडकारण्य और आंध्र-ओडिशा क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ उसेंडी विकल्प, शीर्ष सैन्य रणनीतिकार माने जाने वाले कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा और लंबे समय से वांछित नक्सली कमांडर गणेश उइके को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में मार गिराया।

इनके अलावा बीजापुर, नारायणपुर और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में हुए बड़े ऑपरेशनों में कई सशस्त्र नक्सली ढेर किए गए, जिससे नक्सलियों के संगठन की फील्ड कमांड, हथियार नेटवर्क और मनोवैज्ञानिक बढ़त पूरी तरह टूट गई। इन्हें निष्क्रिय करके गृह मंत्री ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि अब नक्सलवाद के लिए भारत की धरती पर न तो सुरक्षित ठिकाने हैं और न ही नेतृत्व का संरक्षण है।

गृह मंत्री ने एक तरफ जहाँ नक्सलवाद ग्रस्त समाज के लोगों को उससे मुक्त होकर जीने का अवसर दिया, वहीं दूसरी तरफ उनके वैचारिक समर्थकों को चुनौती भी। एक नागरिक के रूप में हम सभी गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति की भावना को जानते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अमित शाह के नेतृत्व में यह देश नक्सलवाद से मुक्त होकर भयमुक्त भारत बनेगा।
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