दैनिक शाक्य समाचार
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के महर्षि कणाद भवन सभागार में प्रोफेसर निरंजन कुमार द्वारा संपादित पुस्तक "राम: जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई" का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति ने किया।
कार्यक्रम में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार मुख्य अतिथि, ऑर्गनाइजर पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर विशिष्ट अतिथि और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह अध्यक्ष के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम के संयोजक व पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार भी मंच पर उपस्थित थे।
मुख्य अतिथि आलोक कुमार ने कहा कि राम भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में स्थित आदर्श हैं। राम केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार के मानक भी हैं। उन्होंने राम को त्याग, मर्यादा, न्याय और लोककल्याण की सर्वोच्च परंपरा का प्रतीक बताया और कहा कि राम राष्ट्र की सामूहिक चेतना के प्रतिनिधि हैं।
कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि राम भारतीय परंपरा में केवल ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों की सतत प्रवाहित धारा हैं। उन्होंने कहा कि रामकथा और रामायण भारतीय समाज की आत्मा हैं। राम मंदिर केवल धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। रामचरित मानस जैसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं और तुलसीदास जैसा कोई दूसरा रचनाकार नहीं, यह भारतीय साहित्य की अद्वितीय धरोहर है।
विशिष्ट अतिथि प्रफुल्ल केतकर ने पुस्तक की वैचारिक गहराई की सराहना करते हुए कहा कि बाहरी प्रभावों और वैचारिक आक्रमणों से भारतीय संस्कृति की जड़ों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में यह पुस्तक सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
पुस्तक के संपादक प्रो. निरंजन कुमार ने बताया कि रामकथा ने विभिन्न धर्मों और परंपराओं को प्रभावित किया है और राम पंथनिरपेक्षता के सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक वैचारिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन मूल्यों की दृष्टि से भगवान राम पर केंद्रित दुर्लभ लेखों का संकलन है। इसमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद जैसे मनीषियों के लेख शामिल हैं। साथ ही मीडिया, मैनेजमेंट, चिकित्सा विज्ञान, इतिहास, दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संस्कृत और हिंदी के विद्वानों के लेख भी समाहित हैं।